2 जून को जनसुनवाई, हर साल 1 करोड़ टन फ्लाई ऐश निकलने की आशंका; ग्रामीणों में बढ़ी चिंता, खेती और स्वास्थ्य पर मंडरा रहा खतरा
रायगढ़। जिले के लारा क्षेत्र में संचालित NTPC Limited की परियोजना को लेकर एक बार फिर ग्रामीणों में आक्रोश और चिंता बढ़ने लगी है। कंपनी अब राखड़ डैम (ऐश डाइक) विस्तार के तीसरे चरण की तैयारी में जुट गई है। इसके लिए आगामी 2 जून को जनसुनवाई प्रस्तावित की गई है। बताया जा रहा है कि इस विस्तार परियोजना के तहत करीब 227 हेक्टेयर जमीन का उपयोग किया जाएगा, जिससे आसपास के गांवों में प्रदूषण और विस्थापन का खतरा और गहरा सकता है।

सूत्रों के अनुसार NTPC लारा की मौजूदा इकाइयों से पहले ही भारी मात्रा में फ्लाई ऐश निकल रही है। अब तीसरे चरण के विस्तार के बाद हर साल लगभग 1 करोड़ टन फ्लाई ऐश उत्पन्न होने की आशंका जताई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले से ही राखड़ उड़ने, जल स्रोत दूषित होने और खेतों की उपज प्रभावित होने जैसी समस्याएं बनी हुई हैं, ऐसे में नया ऐश डाइक क्षेत्र की स्थिति को और गंभीर बना देगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना शुरू होने के समय रोजगार, विकास और प्रदूषण नियंत्रण के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन हकीकत में गांवों को धूल, राख और बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। कई इलाकों में गर्मी के दिनों में राख के महीन कण हवा के साथ घरों तक पहुंच रहे हैं। किसानों का कहना है कि खेतों की मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और भूजल स्तर भी लगातार गिर रहा है।
पर्यावरण से जुड़े जानकारों का मानना है कि फ्लाई ऐश प्रबंधन यदि वैज्ञानिक तरीके से नहीं किया गया तो इसका असर लंबे समय तक पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर पड़ सकता है। केंद्रीय पर्यावरण मानकों के तहत ऐश उपयोग और निगरानी के नियम तय हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर इनकी प्रभावी मॉनिटरिंग को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
इधर जनसुनवाई को लेकर प्रशासनिक तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। प्रभावित गांवों के लोगों का कहना है कि वे जनसुनवाई में अपनी आपत्तियां मजबूती से रखेंगे। ग्रामीणों की मांग है कि पहले मौजूदा प्रदूषण और राखड़ समस्या का स्थायी समाधान किया जाए, उसके बाद किसी नए विस्तार पर विचार हो।

क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि यदि ऐश डाइक का दायरा लगातार बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में कई गांवों की कृषि भूमि पूरी तरह प्रभावित हो सकती है। लोगों को डर है कि उद्योग विस्तार की कीमत कहीं गांवों की जमीन, पानी और स्वास्थ्य को चुकानी न पड़े।















