दुनिया में जब भी जंग, आर्थिक मंदी या महामारी जैसा बड़ा संकट आता है तो निवेशकों का सबसे भरोसेमंद सहारा सोना माना जाता है। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग है। वेस्ट एशिया में जारी तनाव के बीच जहां तेल की कीमतें उछल रही हैं, वहीं सोने के दाम तेजी से गिर रहे हैं। भारत में भी 24 कैरेट सोना अब काफी सस्ता हो चुका है, जो कुछ समय पहले रिकॉर्ड हाई पर था।
आमतौर पर संकट के समय निवेशक शेयर बाजार जैसे रिस्क वाले ऑप्शन से पैसा निकालकर सोने में लगाते हैं। 2008 की आर्थिक मंदी, कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यही ट्रेंड देखने को मिला था। लेकिन इस बार हालात उलट हैं। वेस्ट एशिया संकट के बाद सोने की कीमतों में तेज गिरावट आई है। इसका मतलब है कि निवेशकों का भरोसा फिलहाल सोने से हटकर कहीं और जा रहा है।
ब्याज दरें और बॉन्ड बने बड़ी वजह
सोना कोई ब्याज या रिटर्न नहीं देता। इसलिए जब बाजार में ऐसे ऑप्शन (जैसे सरकारी बॉन्ड) उपलब्ध हों, जो तय रिटर्न देते हैं, तो निवेशक वहां ज्यादा आकर्षित होते हैं। इस समय वैश्विक स्तर पर यह उम्मीद बन रही है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकते हैं। ऐसे में बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न बढ़ जाता है और सोना कम अट्रैक्टिव हो जाता है। यही कारण है कि निवेशक सोने से पैसा निकालकर बॉन्ड में डाल रहे हैं।
मजबूत डॉलर ने भी बढ़ाया दबाव
सोने की कीमतें वैश्विक बाजार में डॉलर में तय होती हैं। जब डॉलर मजबूत होता है, तो अन्य देशों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे उसकी मांग घटती है।वेस्ट एशिया संकट के चलते तेल की कीमतें बढ़ी हैं और देशों को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ रही है। इससे डॉलर की मांग बढ़ी और वह मजबूत हुआ। नतीजतन सोने की कीमतों पर दबाव आ गया।
तेल की कीमतों का सीधा असर
इस पूरे खेल में कच्चे तेल की कीमतें अहम भूमिका निभा रही हैं। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। इसे काबू में रखने के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दरें ऊंची रखते हैं। तेल महंगा होता है तो चीजों के दाम बढ़ने का डर बढ़ जाता है। इसे काबू में रखने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं। ऐसे में लोग सोने की बजाय दूसरे निवेश विकल्प चुनते हैं, इसलिए सोने की कीमत पर दबाव आ जाता है।
निवेशक क्यों बेच रहे हैं सोना?
एक और बड़ी वजह है प्रॉफिट बुकिंग और लिक्विडिटी की जरूरत। सोने ने पिछले दो-तीन साल में शानदार रिटर्न दिया था। जब कीमतें गिरनी शुरू हुईं, तो कई निवेशकों ने मुनाफा सुरक्षित करने के लिए सोना बेचना शुरू कर दिया। इसके अलावा, शेयर बाजार में गिरावट के चलते निवेशकों को नुकसान हुआ, जिसकी भरपाई के लिए उन्होंने सोना बेचकर नकदी जुटाई। इससे बाजार में सप्लाई बढ़ी और कीमतें और नीचे आ गईं।
क्या अब डॉलर ही नया सेफ हेवन है?
कुछ हद तक हां। फिलहाल संकट के समय निवेशक डॉलर की ओर ज्यादा झुक रहे हैं। दुनिया में ज्यादातर व्यापार और खासकर तेल का लेनदेन डॉलर में होता है। ऐसे में संकट के समय देशों और निवेशकों को डॉलर की जरूरत बढ़ जाती है। हालांकि, लंबे समय में सोना अभी भी सुरक्षित निवेश माना जाता है, क्योंकि यह एक फिजिकल एसेट है और इसे आसानी से प्रतिबंधित या फ्रीज नहीं किया जा सकता।
भारत में क्या है स्थिति?
भारत में सोने की मांग दो हिस्सों में बंटी होती है ज्वेलरी और निवेश। कीमतें बढ़ने के बाद ज्वेलरी की मांग थोड़ी कमजोर पड़ी है, लेकिन निवेश के तौर पर सोना अभी भी मजबूत बना हुआ है। गोल्ड ETF में लगातार निवेश हो रहा है, जो बताता है कि लोगों का भरोसा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जैसे ही कीमतें स्थिर होंगी, खरीदारी फिर बढ़ सकती है।
आगे क्या होगा?
सोने की कीमतों का भविष्य काफी हद तक वेस्ट एशिया संकट और तेल की कीमतों पर निर्भर करेगा। अगर तेल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो महंगाई का दबाव कम होगा, ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद फिर बढ़ेगी और सोने की कीमतें दोबारा चढ़ सकती हैं। वहीं अगर संकट गहराता है और तेल और महंगा होता है, तो बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। हालांकि, ऐसे हालात में भी लंबे समय में सोना मजबूत वापसी कर सकता है।
क्या निवेशकों को घबराने की जरूरत है?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सोने में गिरावट कोई नई बात नहीं है। पहले भी कीमतों में गिरावट आई है, लेकिन बाद में सोना मजबूत होकर उभरा है।














