भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के बैंकिंग सिस्टम को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। 27 अप्रैल को RBI ने एसेट क्लासिफिकेशन और लोन प्रावधान (Provisioning) से जुड़े 14 नए और सख्त नियम लागू किए हैं। इन नियमों का असर इस बात पर पड़ेगा कि बैंक अपने खराब लोन (Bad Loans) की पहचान कैसे करते हैं और उनके लिए कितनी पूंजी अलग रखते हैं।
पुराना तरीका बदला, अब ‘ECL’ मॉडल लागू
अब तक बैंक ‘Incurred Loss’ मॉडल पर काम करते थे, जिसमें नुकसान होने के बाद उसके लिए प्रावधान किया जाता था। लेकिन अब RBI ने ‘Expected Credit Loss (ECL)’ मॉडल अपनाने के निर्देश दिए हैं।
इस नए मॉडल के तहत बैंकों को पहले से ही संभावित जोखिम का अनुमान लगाना होगा। अगर किसी लोन में डिफॉल्ट का थोड़ा भी खतरा दिखता है, तो बैंक को उसके लिए पहले से ही फंड अलग रखना होगा। यह तरीका पूरी तरह से भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने वाला (forward looking) माना जा रहा है।
तीन स्टेज में बंटेगा आपका लोन
नए नियमों के मुताबिक, क्रेडिट रिस्क यानी जोखिम के आधार पर लोन को तीन श्रेणियों में बांटा जाएगा:
- स्टेज 1: वे लोन जिनमें जोखिम बहुत कम है। इनके लिए बैंक अगले 12 महीनों की डिफॉल्ट संभावना के आधार पर फंड अलग रखेंगे।
- स्टेज 2: वे लोन जिनमें जोखिम बढ़ता दिख रहा है। यहां पूरे लोन की अवधि के हिसाब से खतरा आंका जाएगा।
- स्टेज 3: वे लोन जो पूरी तरह खराब (क्रेडिट इम्पेयर्ड) हो चुके हैं।
NPA की परिभाषा में बदलाव नहीं
भले ही लोन आंकने का तरीका बदल गया हो, लेकिन RBI ने स्पष्ट किया है कि NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) की परिभाषा पहले जैसी ही रहेगी। यानी अगर किसी लोन की किश्त 90 दिनों तक नहीं चुकाई जाती है, तो उसे डिफॉल्ट या NPA ही माना जाएगा।
कब से होंगे लागू?
RBI ने बैंकों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय दिया है। ये नए नियम अप्रैल 2027 से लागू होंगे। इससे पहले RBI ने अक्टूबर में ड्राफ्ट जारी कर बैंकों की राय भी ली थी। जानकारों का मानना है कि इन 14 नए नियमों से बैंकों की वित्तीय स्थिति और मजबूत होगी और भविष्य में आने वाले किसी भी आर्थिक संकट से निपटने में आसानी होगी।














