Sawan Purnima Vrat हिंदू धर्म में श्रावण पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। कहते हैं जो भक्त इस पूर्णिमा पर व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि विधान पूजा करते हैं उनके जीवन के सारे कष्टों का निवारण हो जाता है। इस साल श्रावण पूर्णिमा व्रत 27 अगस्त को रखा जाएगा। यह दिन दान-पुण्य के लिए भी बेहद फलदायी माना जाता है। श्रावण पूर्णिमा को कजरी पूनम, नारियली पूर्णिमा और पवित्रोपना के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं इस पूर्णिमा पर चंद्र देव की पूजा करने से चंद्रदोष से भी मुक्ति मिलती है। चलिए अब जानते हैं श्रावण पूर्णिमा के दिन कौन सी कथा पढ़नी चाहिए।
सावन पूर्णिमा की व्रत कथा
श्रावण पूर्णिमा की कथा अनुसार, राजा चंद्रहास की नगरी कातिका में एक धनेश्वर नाम का ब्राह्मण रहा करता था, जिसकी पत्नी का नाम रूपवती था। ब्राह्मण के पास धन-दौलत सबकुछ था, परंतु वह संतानहीन था और यही उसके दुखी रहने का सबसे बड़ा कारण था। एक दिन एक तपस्वी योगी उस नगरी में आये, वह उस ब्राह्मण के घर को छोड़कर बाकी सारे घरों से भिक्षा मांगने लगे। कई दिनों तक ऐसा ही चलता रहा।एक दिन ब्राह्मण ने तपस्वी योगी से पूछा कि वह उनके घर से भिक्षा क्यों नहीं लेते हैं। तब योगी ने बताया, कि जिस घर में संतान न हो उस घर से भिक्षा लेना पाप माना जाता है।
तपस्वी योगी की बात सुनकर धनेश्वर को बहुत दुख हुआ और उसने तपस्वी से संतान सुख पाने का उपाय पूछा। उस तपस्वी ने धनेश्वर को देवी चंडी की आराधना करने के लिए कहा। अगले दिन से ही धनेश्वर मां चंडी की उपासना करने के लिए जंगल में चला गया। धनेश्वर ने 16 दिनों तक मां चंडी की पूजा-अर्चना करने के साथ-साथ व्रत भी किया। फिर 16 दिन के बाद देवी चंडी ने धनेश्वर को दर्शन दिए और कहा कि शीघ्र ही तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी, परंतु वह पुत्र 16 वर्ष तक ही जीवित रहेगा।
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देवी की बात सुनकर धनेश्वर परेशान हो गए। तब देवी मां बोलीं कि यदि ब्राह्मण दंपति 32 पूर्णमासियों का व्रत विधिपूर्वक करेंगे, तो उनके पुत्र को दीर्घायु की प्राप्ति होगी। इसके साथ ही यदि वह 32 पूर्णमासी तक आटे के दीप बनाकर शिवजी का पूजन करेंगे, तभी यह व्रत पूर्ण माना जाएगा। इसके साथ ही माता ने ये भी कहा कि यदि प्रात: काल तुम्हें इस स्थान पर आम का वृक्ष दिखाई देगा तो उस पर से शीघ्र ही तुम एक फल तोड़कर अपने घर ले जाना और अपनी पत्नी से ये पूरा वृतांत बताना। ब्राह्मण ने ऐसा ही किया और अपनी पत्नी को आम का फल खाने को दे दिया। इसके बाद ब्राह्मणी गर्भवती हो गई।
कुछ समय बाद उनके घर पर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने देवीदास रखा। चंड़ी माता के कहे अनुसार, उस ब्राह्मण दंपति ने 32 पूर्णमासी का व्रत रखना प्रारंभ कर दिया। जब देवीदास 16 वर्ष का होने वाला था तो उस समय उसके माता-पिता ने उसे उसके मामा के साथ विद्या ग्रहण करने के लिए काशी भेज दिया। काशी जाते समय दोनों मामा- भांजा रात बिताने के लिए किसी गांव में ठहरे और उसी दिन उस गांव में एक ब्राह्मण की सुंदर कन्या का विवाह होने वाला था। जिस जगह पर वर और उसकी बारात ठहरी हुई थी, ठीक उसी जगह पर देवीदास और उसके मामा भी ठहरे हुए थे। लेकिन लगन के समय वर की अचानक से तबीयत खराब हो गई, तब वर के पिता ने अपने रिश्तेदारों से परामर्श करके यह निश्चय किया कि क्यों न देवीदास से लड़की की शादी करा दी जाए।
Sawan Purnima Vratवर के पिता ने देवीदास के मामा से ये बात बताई, जिस पर देवीदास के मामा राजी हो गए। विवाह के कुछ समय बाद, जब काल देवीदास के प्राण लेने आया तो ब्राह्मण दंपति के व्रत के कारण देवीदास को कुछ नहीं हुआ और उसे लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। कहते हैं जो भी पूर्णिमा का व्रत रखता है उसके हर प्रकार के संकट से दूर हो जाते हैं।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। Rgh एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)














